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जब डीएम-कप्तान के खिलाफ सच दिखाने पर मुझे जरावटी थाने में किया गया बंद: वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने बढ़ाई मदद की हाथ | ND Live

📍 उत्तर प्रदेश (नई दिल्ली) 📅 23 Jul 2026 ✍️ NDLIVE ब्यूरो
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जब डीएम-कप्तान के खिलाफ सच दिखाने पर मुझे जरावटी थाने में किया गया बंद: वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने बढ़ाई मदद की हाथ | ND Live

डीएम और कप्तान के खिलाफ सच दिखाने की मुझे यह सजा मिली: जरावटी थाने की उस कैद से लेकर चित्रा त्रिपाठी के सहयोग तक की पूरी दास्तान!

बुलंदशहर/नई दिल्ली:

पत्रकारिता की राह फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों भरा वह सफर है जहां सच लिखने की कीमत कई बार अपनी आजादी दांव पर लगाकर चुकानी पड़ती है। बुलंदशहर जिले में जब मैंने (सलाहुद्दीन खान) प्रशासन के मुखिया यानी डीएम और जिले के कप्तान (SSP) की कार्यप्रणाली के खिलाफ बेबाक ग्राउंड रिपोर्टिंग और तीखी खबरें चलाईं, तो सिस्टम बौखला उठा। सत्ता और प्रशासनिक हनक के आगे घुटने न टेकने की सजा मुझे यह दी गई कि मुझे जबरन बुलंदशहर के जरावटी थाने में बंद कर दिया गया। उस वक्त चारों तरफ अंधेरा था और ऐसा लगा कि अब सच की आवाज को हमेशा के लिए दबा दिया जाएगा।

लेकिन संकट की उस घड़ी में देश की जानी-मानी और बेबाक वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी जी फरिश्ता बनकर सामने आईं। उन्होंने हमारी इस पूरी पीड़ा को गंभीरता से सुना और बिना एक पल गंवाए सुबह होते-होते पूरी ताकत लगाकर मुझे उस कैद से सुरक्षित बाहर निकलवाया। चित्रा जी ने हमेशा यह साबित किया है कि पत्रकारिता में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता—चाहे कोई बड़े नेशनल चैनल का एंकर हो या जमीन पर पसीना बहाने वाला एक छोटा डिजिटल रिपोर्टर, संकट के वक्त हर पत्रकार एक-दूसरे का भाई और ढाल होता है। आज के दौर में जब कुछ लोग सिर्फ व्यूज के लिए पत्रकारों पर कीचड़ उछालने में लगे हैं, चित्रा जी का यह कदम और उनका यह संदेश कि "पत्रकारिता में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता" हम सबके लिए एक मिसाल है।

BULANDSHAHR / NEW DELHI:

Journalism on the frontline comes with a heavy price. When I, Salauddin Khan, courageously exposed the administrative lapses and raised hard-hitting questions against the District Magistrate (DM) and the Senior Superintendent of Police (SSP) in Bulandshahr, the local administration retaliated aggressively. I was wrongfully detained and locked inside the Jarawati police station to suppress our voice and media coverage.

In that darkest hour when all hopes seemed lost, veteran national journalist Chitra Tripathi stood like a rock of support. Upon hearing our plight, she took immediate cognizance and ensured our safe release by the very next morning. Her remarkable intervention reaffirmed a vital truth: in the fraternity of journalism, titles of 'small' or 'big' hold no value; every field reporter, digital creator, and mainstream journalist is part of one unified family. While opportunists chase views by targeting media personnel, leaders like Chitra Tripathi prove that true journalism is all about standing shoulder-to-shoulder with the truth and with each other.

ND Live के संस्थापक और संपादक होने के नाते, मैं सलाहुद्दीन खान दिल की गहराइयों से चित्रा त्रिपाठी जी का आभार व्यक्त करता हूँ और देश के तमाम पत्रकारों से अपील करता हूँ कि आपसी भेदभाव भूलो, एक रहो! इस सच्ची और प्रेरणादायक कहानी को हर जगह शेयर करें ताकि देश जाने कि असली पत्रकारिता किसे कहते हैं! ????

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